राजनीति

मुफ्तखोरी क्या अब बनेगी वैश्विक समस्या?

भारत में मुफ्तखोरी योजनाओं की शुरुआत कहां से हुई, उसके बारे में चर्चा करते हुए यदि हम उसके प्रकार और फैलाव के बारे में देखते हैं तो ध्यान में आता है कि सरकारी खजाने पर इसका सर्वाधिक असर पंजाब, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान, केरल, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु आदि राज्यों में ज्यादा दिखाई देता है…

भारत में मुफ्तखोरी योजनाएं, जिन्हें फ्रीबीज भी कहा जाता है, पिछले लंबे समय से एक आम बात हो चुकी हैं। मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त यात्रा से आगे बढ़ते हुए अब बात साइकिल, स्कूटी, मंगलसूत्र, लैपटॉप और टेब तक पहुंच चुकी है। राजनैतिक दल, जो पहले सैद्धांतिक रूप से फ्रीबीज़ का विरोध करते थे, वे भी बड़े पैमाने पर इस प्रकार की योजनाओं की घोषणाएं धड़ल्ले से करते हुए दिखाई दे रहे हैं। दिलचस्प बात तो यह है कि इन फ्रीबीज़ को जन कल्याण के नाम पर अन्य प्रकार से औचित्यपूर्ण भी ठहराया जाता है। इसी प्रकार की फ्रीबीज़ की घोषणाएं कुछ अन्य देशों में भी देखने और सुनने को मिलने लगी हैं। कुछ दिन पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सभी व्यस्क लोगों को 5 हजार डॉलर देने की पेशकश की गई है, जिसमें शर्त यह है कि राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को अमरीकी संसद यानी हाउस और सेनेट में जीत हासिल हो। यानी अमरीका में मध्यावधि चुनावों के मद्देनजर अमरीकी मतदाताओं को सीधे तौर पर यह पेशकश है कि आप ट्रंप की पार्टी को वोट दीजिए और आपको 5 हजार डॉलर दिए जाएंगे। दिलचस्प बात यह है कि अमरीका से प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी विभिन्न एजेंसियां भारत के प्रजातंत्र के बारे में टिप्पणियां तो करती ही हैं, भारतीय प्रजातंत्र में शांतिपूर्ण चुनाव एवं सत्ता हस्तांतरण, प्रेस, मीडिया और बोलने की स्वतंत्रता, स्वायत्त न्याय पालिका एवं अन्य संस्थाओं के बावजूद भारतीय प्रजातंत्र को अत्यंत निचले स्तर पर रेटिंग की जाती है। हालांकि पिछले कुछ समय से ये एजेंसियां अमरीकी प्रजातंत्र की भी रेटिंग गिरा रही है। लेकिन अमरीकी राष्ट्रपति द्वारा सीधे तौर पर वोट के बदले नोट देने की पेशकश, दुनिया में एक नई बहस को जन्म दे रही है कि क्या अब विकास, स्वच्छ प्रशासन, संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, आमजन के लिए सुविधाओं की बजाय फ्रीबीज़ के आधार पर प्रजातंत्र में मतदाता वोट डाला करेंगे। ऐसे में यदि सत्ता पाने के लिए राजनीतिक दल वोटरों को राशि देने की पेशकश करने में प्रतिस्पर्धा करने लगे तो उसका खामियाजा किसे भुगतना पड़ेगा।

यानी यदि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की घोषणा के बाद डेमोक्रेट पार्टी इस राशि से ज्यादा की पेशकश कर दे, तो क्या होगा? यह राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता यहां रुकने वाली नहीं है, यह नीचे राज्यों तक जाएगी और वहां गवर्नर की रेस में लगे दल भी इसी प्रकार की पेशकश करने लगे, तो उसका असर जन सेवाओं पर कितना पड़ सकता है, इसका अंदाजा भारत में इस प्रतिस्पर्धा से लगाया जा सकता है। भारत में मुफ्तखोरी योजनाओं की शुरुआत कहां से हुई, उसके बारे में चर्चा करते हुए यदि हम उसके प्रकार और फैलाव के बारे में देखते हैं तो ध्यान में आता है कि सरकारी खजाने पर इसका सर्वाधिक असर पंजाब, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान, केरल, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु आदि राज्यों में ज्यादा दिखाई देता है। भारत के महालेखाकार और अकेंक्षक (कैग) के अनुसार 2024-25 में पंजाब, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु में कुल सरकारी खर्च के 13.5 प्रतिशत से ज्यादा इस प्रकार की योजनाओं मे खर्च हो रहा था। हालांकि तमिलनाडु और दिल्ली इन मुफ्तखोरी योजनाओं के खासे चर्चित उदाहरण रहे हैं, लेकिन इन राज्यों में सरकारी कर्ज सरकारी खातों में दिखाई नहीं देता, लेकिन यह इसलिए है कि दिल्ली में प्रति व्यक्ति सरकारी राजस्व, राष्ट्रीय औसत के दुगने से भी अधिक है। इसका अप्रत्यक्ष कारण यह है कि दिल्ली की प्रति व्यक्ति आय भी राष्ट्रीय औसत के मुकाबले दुगनी से भी अधिक है। कमोबेश यही स्थिति तमिलनाडु की भी है। भारतीय जनता पार्टी इन मुफ्तखोरी योजनाओं का सैद्धांतिक रूप से विरोध करती रही है। लेकिन अन्य राजनीतिक दलों की मुफ्तखोरी योजनाओं के मद्देनजर अब यह पार्टी भी सत्ता के समीकरण अपने पक्ष में करने हेतु खुलकर इन मुफ्तखोरी योजनाओं की केवल घोषणा ही नहीं कर रही, बल्कि उनके फायदे भी गिना रही है। उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में लाडली बहन योजना, दिल्ली में मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना और कई अन्य राज्यों में इस प्रकार की योजनाएं चल रही हैं। हालांकि दिल्ली की महिलाओं के लिए दी जाने वाली राशि केवल इसके लिए पात्र (गरीब) महिलाओं को ही मिलेगी। दिल्ली मे भारतीय जनता पार्टी ने आम आदमी पार्टी द्वारा दी जा रही मुफ्त बिजली, पानी आदि की सुविधा को बरकरार भी रखा है।

इन सभी मुफ्तखोरी योजनाओं का असर देश पर बढ़ते कर्ज के रूप में भी दिखाई देता है। गौरतलब है कि 2010-11 में देश पर सम्मिलित कर्ज केंद्र और राज्य जीडीपी का 65.6 प्रतिशत था। जिसमें केंद्र सरकार का कर्ज जीडीपी का 48.58 प्रतिशत और राज्यों का कर्ज जीडीपी का 23.5 प्रतिशत था। गौरतलब है कि देश पर सम्मिलित कर्ज आकलित करने के लिए केंद्र और राज्यों के आपसी लेनदेन को समायोजित किया गया है। 2024-25 में यह कर्ज बढक़र जीडीपी के 81.9 प्रतिशत तक पहुंच गया। जहां केंद्र सरकार का कर्ज 48.8 प्रतिशत से बढक़र 57.5 प्रतिशत तक पहुंचा, राज्य सरकारों पर कर्ज 23.5 प्रतिशत से बढ़ता हुआ 28.5 प्रतिशत तक पहुंच गया। जिन राज्यों द्वारा मुफ्त खोरी की योजनाओं को ज्यादा अपनाया गया है उन राज्यों का कजऱ् राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। 2024-25 में, कई राज्यों पर उनके जीएसडीपी (राज्य की जीडीपी) के मुकाबले काफी ज्यादा कजऱ् था, पंजाब में यह 47.3 प्रतिशत, हिमाचल प्रदेश में 44.0 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 38.0 प्रतिशत, केरल में 37.0 प्रतिशत, राजस्थान में 36.0 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 34.7 प्रतिशत। कजऱ् का इतना ज़्यादा बोझ राजकोषीय गुंजाइश को सीमित करता है, ब्याज का बोझ बढ़ाता है और उत्पादक सार्वजनिक निवेश को रोक सकता है। आमदनी से ज्यादा खर्च और तदनुसार घाटे के बजटों ने देश पर कर्ज बढ़ाया ही है, लेकिन हाल ही में मुफ्तखोरी की योजनाओं के चलते यह गति और तेजी से बढ़ी है।

गौरतलब है कि 2010-11 और 2018-19 के बीच देश पर कुल कर्ज 63.6 प्रतिशत से मामूली सा बढक़र 66.5 प्रतिशत तक ही हुआ था। लेकिन पिछले मात्र 6 वर्षों में यह 2024-25 तक बढक़र जीडीपी के 81.9 प्रतिशत तक पहुंच जाना वास्तव में चिंता का विषय है। यह भी सही है कि केंद्र सरकार की देनदारी में बड़ी वृद्धि कोरोना काल में हुई थी, जब 2019-20 और 2020-21 के दौरान केंद्र सरकार की देनदारियां जीडीपी के 62.9 प्रतिशत और राज्य सरकारों की देनदारियां 31.1 प्रतिशत तक पहुंच गई और दोनों की सम्मिलित देनदारियां 88.7 प्रतिशत तक पहुंच गई। हालांकि उसके बाद सम्मिलित लेनदारिया 81.9 प्रतिशत तक घट गई है, जिनमें केंद्र की देनदारियां 57.1 प्रतिशत हैं और राज्यों पर अभी भी ये 28.5 प्रतिशत बनी हुई हैं। ध्यातव्य है कि लेकिन अभी भी यह 2010-11 के 65.6 प्रतिशत से कहीं अधिक हैं। समझा जा सकता है कि कहीं न कहीं मुफ़्तख़ोरी की स्कीमों के कारण राज्यों पर कजऱ् का बोझ बढ़ रहा है, जिसके चलते देश पर कुल कर्ज का बोझ बढ़ा है। कुछ लोगों का कहना है कि मुफ्तखोरी की यह स्कीम, जिसमें राष्ट्रपति ट्रंप ने सभी वोटरों को वायदा किया है यदि वे उन्हें सीनेट और हाउस में विजय दिला दें, तो वे हर मतदाता को 5000 अमरीकी डॉलर देंगे। भारत का उदाहरण हमारे सामने है, कि कैसे भारत के राज्यों में मुफ़्तख़ोरी की स्कीमों के कारण वे कजऱ् के बोझ तले दब रहे हैं और उसकी वजह से वे अपने नागरिकों के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाने में असमर्थ हैं। गौरतलब है कि अमरीका में पहले से ही कजऱ् का बोझ बढ़ता ही जा रहा है अमरीका में 2010-11 में कजऱ् का बोझ उनकी जीडीपी का 95.7 प्रतिशत था, जो 2025 में बढ़ता हुआ, 123.9 प्रतिशत तक हो चुका है। आईएमएफ का कहना है कि अमरीका पर सरकारी कर्ज का बोझ 2030 तक उसकी जीडीपी के 141.5 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।-डा. अश्वनी महाजन

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