परिस्थितियां ही किसी देश की राजनीति को दिशा देती हैं

जिन परिस्थितियों से कोई देश गुजर रहा होता है, उस देश की राजनीति उसी सांचे में ढल जाती है। जैसे-जैसे विदेशी आक्रमण होते रहे, भारत की राजनीति का स्वभाव भी वैसा-वैसा होता चला गया। किसी भी देश की ‘राजनीति सर्वोपरि’ होती है। उस देश की संस्कृति, उसका जीवन-दर्शन, उसकी बौद्धिक गतिविधियां उसी ढंग से बदलती आई हैं। उस देश के साहित्यकारों, लेखकों, कलाकारों, कवियों के स्वभाव बदलने लगते हैं। साहित्यकार क्या लिख रहे हैं, क्यों ऐसा लिखने लगे हैं, उनका लिखना क्या कह रहा है? साहित्याकर समझ क्या रहा है, क्या कह रहा है, वह किस दिशा की ओर इशारा कर रहा है? यह सोच-समझ उस देश की राजनीति है। लेखकों की लेखनी का प्रभाव उसी ओर झुकने लगता है।
महाभारत के युद्ध के पश्चात भारत सम्राट युधिष्ठिर तीरों की शैया पर लेटे पितामह भीष्म के पास राज चलाने का ढंग पूछने गए। पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को दो शब्दों में राजधर्म समझा दिया। ‘राजा हि कालस्य कारणम।’ अर्थात राजा भी समय का गुलाम है। समय अर्थात हालात, परिस्थितियों के अधीन हैं। यहां राजा का अर्थ है-राजनीति। काल का अंश है समय (परिस्थितियां) समय तटस्थ रहता है। परिस्थितियां साक्षी होती हैं। परिस्थितियां राजनीति (राजा) को मोड़ देती हैं। राजनीति का रूप-स्वरूप सब परिस्थितियों के अनुरूप हो जाता है।
एक समय था कि सोवियत यूनियन कम्युनिस्ट प्रधान एक शक्तिशाली देश था। परिस्थितियां बदलीें कि 1990-91 आ गया। देश के राष्ट्रपति ‘गोर्बाच्योव’ बन गए। ‘सोवियत यूनियन आफ रशिया’ से 17 भाग टूट कर स्वयं सार्वभौमिक अलग देश बन गए। आज जो देश यूक्रेन रूस से पिछले 4 वर्ष से युद्ध कर रहा है, 1990-91 में तो ‘सोवियत यूनियन आफ रशिया’ का ही एक भाग था। आज रूस स्टालिन का रूस नहीं रहा। परिस्थितियां बदल गईं, रूस की राजनीति भी बदल गई। ‘फ्रांस की क्रांति’ ने सारे फ्रांस की राजनीति को बदल दिया। फ्रांस के सम्राट और उनकी पत्नी को फांसी पर लटका दिया गयो। उनकी लाशों तक का पता नहीं लगा। राजशाही की राख पर लोकतंत्र की नींव पड़ गई। हम नारा ही लगाते रहे-‘अंधेरे में एक चिंगारी, अटल बिहारी-अटल बिहारी।’ उधर अटल बिहारी देश के प्रधानमंत्री भी बन गए।
परिस्थितियां कब राजनीति को बदल दें, किसी को पता नहीं। इसीलिए तो सयाने कहते आए हैं ‘समय से डरो। इसका कोई भरोसा नहीं।’ ‘समय खा गया, आसमां कैसे-कैसे?’ 2014 में परिस्थितियां फिर अपना रंग लाईं और ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ’ के एक प्रचारक नरेंद्र मोदी को भारत का प्रधानमंत्री बना दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अखंड भारत, अखंड हिंदू राष्ट्र का समर्थन करता रहा, मोहम्मद अली जिन्ना अलग-देश पाकिस्तान लेकर भाग गए। इसे क्या कहोगे? एक तरफ महात्मा गांधी सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह का उपदेश देशवासियों को देते रहे, उधर नाथूराम गोडसे ने उन्हें गोली से उड़ा दिया। है न विडम्बना? पंडित जवाहर लाल नेहरू, भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के नेता, देश की खातिर बढिय़ा जीवन यापन त्याग कर अंग्रेजों की जेलों में रहे और लाठियां खाते रहे। हां, स्वतंत्र भारत (बंटवारे के बाद) के पहले प्रधानमंत्री जरूर बन गए परन्तु परिस्थितिवश वही नेहरू आज हिंदुस्तान के सबसे बड़े दुश्मन कहला रहे हैं। उन पर तरह-तरह के लांछन लगाए जा रहे हैं।
सोच थी कि भारत का प्रत्येक नागरिक आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बने, कहां आज भारत का युवा डिग्री को गले में लटकाए ‘कॉकरोच राजनीतिक दल’ बनाने के लिए सड़कों पर आ गया। राजनीति ने अराजकता का रूप ले लिया है। नेहरू-गांधी की विचारधारा पर तो पानी ही फेर दिया गया, परिस्थितियों के मकडज़ाल में हिंसा और ध्रुवीकरण साढ़ेसाती बनकर देश को निगल गया। भ्रष्टाचार आगे आ गया और सत्ता का प्रभाव शून्य हो गया। सबसे बड़ा संताप तो भारत के योगियों, संन्यासियों, साधु-संतों, महात्माओं, मठाधीशों, चारों मठों के आचार्यों से है। मंदिरों-मठों के प्रेरणास्रोत पैसे से जुड़ गए। राजनीति दंडों, अंडों, बुलडोजरों पर आधारित हो गई। वास्तविकता तो यह है कि साधारण देशवासी मुंह फैलाए आंखें तरेरे अपने भाग्य को कोस रहा है। बैंकों में गरीब जनता का पैसा, धन्ना सेठ लेकर भाग गए। किस पर दोष धरें। परिस्थितियों के हाथों में राजनीति डगमगा रही है। उम्मीद तो मुझे अब भी है कोई न कोई श्री गुरु तेग बहादुर ‘हिंद की चादर’ बनकर जरूर आएंगे।-मा. मोहन लाल



