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कैश कांड में बड़ा खुलासा… स्टोर रूम में नोट देखने वाले दस लोग, जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच कमेटी रिपोर्ट की 10 बड़ी बातें

नई दिल्ली:कैश कांड में दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस वर्मा की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। जस्टिस यशवंत वर्मा के आवास पर कैश मिलने के आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित कमेटी ने एक रिपोर्ट पेश की है। कमेटी में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जी.एस. संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जज अनु शिवरामन शामिल थीं। कमेटी ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ गंभीर निष्कर्ष निकाले हैं। कमेटी ने उनके इस दावे को भी खारिज कर दिया है कि यह सब उन्हें फंसाने के लिए किया गया था।

रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस वर्मा के घर के स्टोररूम में कैश मिला था। बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार कमेटी की रिपोर्ट में कम से कम दस चश्मदीदों ने जले हुए कैश को देखा था। ये सभी दिल्ली फायर सर्विस और दिल्ली पुलिस के अधिकारी थे। कमेटी की रिपोर्ट से 10 प्रमुख बातें सामने निकलकर आई हैं-

इलेक्ट्रॉनिक सबूतों से पुष्टि: चंडीगढ़ की केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला द्वारा प्रमाणित वीडियो रिकॉर्डिंग और तस्वीरों ने गवाहों के बयानों की पुष्टि की है। जस्टिस वर्मा ने मौके पर लिए गए वीडियो का खंडन नहीं किया है।

दस अधिकारियों ने देखी जली हुई नकदी: दिल्ली अग्निशमन सेवा और दिल्ली पुलिस के कम से कम दस अधिकारियों ने जस्टिस वर्मा के स्टोररूम में जली हुई नकदी के ढेर देखने की पुष्टि की।

कर्मचारियों की वफादारी: कमेटी ने पाया कि जस्टिस वर्मा के कर्मचारी उनके खिलाफ गवाही नहीं देंगे क्योंकि वे उनके प्रति वफादार हैं, जबकि स्वतंत्र गवाहों के बयान जस्टिस वर्मा के खिलाफ जाते हैं।

CCTV डेटा गायब होने का दावा खारिज:
 जस्टिस वर्मा का CCTV डेटा खोने का दावा खारिज कर दिया गया। कमेटी ने कहा कि उनके पास डेटा सुरक्षित करने के लिए पर्याप्त समय था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।

बेटी का बयान: कमेटी ने जस्टिस वर्मा की बेटी, दीया वर्मा के गलत बयानों पर सवाल उठाया, जिन्होंने वीडियो और जली हुई नकदी के बारे में गलत जानकारी दी और बाद में अपने बयान से पलटने की कोशिश की।

स्टोररूम तक पहुंच सीमित: कमेटी ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि स्टोररूम सभी के लिए खुला था और किसी ने नकदी फंसाने के लिए रखी थी। स्टोररूम तक पहुंच केवल जस्टिस वर्मा या उनके परिवार के सदस्यों के पास थी।

घटना की रिपोर्ट नहीं की, ट्रांसफर स्वीकार किया: जस्टिस वर्मा या उनके परिवार ने इस घटना की रिपोर्ट नहीं की और न ही CCTV फुटेज प्राप्त की। घटना के बाद उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अपने ट्रांसफर का प्रस्ताव बिना विरोध के स्वीकार कर लिया।

साजिश के सिद्धांत में कमी: जस्टिस वर्मा का साजिश का सिद्धांत खारिज कर दिया गया क्योंकि उन्होंने किसी विशेष व्यक्ति का नाम नहीं लिया या यह नहीं बताया कि उन्हें क्यों निशाना बनाया जा रहा है।

नकदी का हिसाब देने में विफल: जस्टिस वर्मा जली हुई नकदी का हिसाब देने में विफल रहे और यह बताने में भी विफल रहे कि नकदी कहां से आई या यह किसकी थी।

घरेलू कर्मचारियों ने हटाई जली हुई नकदी: कमेटी ने निष्कर्ष निकाला कि जस्टिस वर्मा के दो सबसे भरोसेमंद कर्मचारियों ने आग लगने के बाद स्टोररूम से जली हुई नकदी को हटाने में मदद की थी।

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