हदों के पार महंगाई

खुदरा महंगाई ने बीते 23 माह का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। भारत सरकार के ही सांख्यिकी मंत्रालय ने आंकड़े जारी किए हैं कि सितंबर, 2026 में खुदरा महंगाई दर 5.54 फीसदी रही। यह अक्तूबर, 2024 के बाद का उच्चतम स्तर है। तब महंगाई दर 6.2 फीसदी थी। भारतीय रिजर्व बैंक का अनुमान है कि आने वाले महीनों में भी महंगाई बढ़ेगी। अक्तूबर-दिसंबर की औसत महंगाई दर 6 फीसदी या उससे अधिक भी हो सकती है। केंद्रीय बैंक ने महंगाई दर की सीमा वैसे तो 4 फीसदी तय कर रखी है, लेकिन उसे 6 फीसदी तक ‘सामान्य’ मान कर तमाम आकलन और विश्लेषण किए जाते हैं। लगातार चौथे माह उस ‘लक्ष्मण-रेखा’ को लांघा गया है, क्योंकि खाद्य महंगाई दर और शहरी-ग्रामीण इलाकों में महंगाई की स्थितियां भिन्न और अधिक हैं। खाद्य महंगाई दर सितंबर में बढ़ कर 7.74 फीसदी तक पहुंच गई। गांवों में खुदरा महंगाई दर 5.24 फीसदी से बढ़ कर 6.08 फीसदी हो गई। ग्रामीण इलाकों में खाद्य महंगाई दर 8.06 फीसदी और शहरों में 7.18 फीसदी दर्ज की गई है। ये तमाम आंकड़े रिजर्व बैंक की तय हदों के पार हैं, लिहाजा साफ है कि महंगाई लगातार बढ़ती जा रही है। गैर-सरकारी और पेशेवर संगठनों, संस्थानों, एजेंसियों के आंकड़े भिन्न और अपेक्षाकृत अधिक हैं। आम आदमी महंगाई के इन प्रतिशत वाले आंकड़ों का अर्थशास्त्र नहीं जानता। उसके लिए महंगाई वहीं से शुरू होती है, जब आलू, प्याज, टमाटर, लहसुन, नींबू, अदरक और हरी मिर्च सरीखी रोजमर्रा की सब्जियां महंगी मिलने लगती हैं। इस बाजार और भाव पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है, क्योंकि सब्जी मंडी के व्यापारी आपस में मिल कर कीमतें तय कर लेते हैं, वहीं से खुदरा बाजार भी महंगा हो जाता है। गली-मुहल्ले के छोटे कारोबारी और रेहड़ीवाले भी उसी अनुपात में दाम बढ़ा देते हैं। तर्क दिया जाता है कि ‘ऊपर’ से ही भाव बढ़ गए हैं। हम क्या कर सकते हैं जी? यदि प्याज करीब 108 फीसदी और लहसुन 55 फीसदी महंगा और आलू 50 रुपए प्रति किलो बिक रहा है, तो यह किस अर्थशास्त्र के आधार पर तय किया जाता है, कमोबेश आम आदमी नहीं जानता।
सरकार के अधीन कई संस्थान, प्राधिकरण, संघ आदि ऐसे हैं, जो इन सब्जियों की तुरंत आपूर्ति कर आम उपभोक्ता को राहत दे सकते हैं और मुद्रास्फीति को तय हदों के भीतर रख सकते हैं। वे दाम बढऩे की स्थितियों में ऐसा कुछ करते भी हैं, लेकिन वह ‘ऊंट के मुंह में जीरे समान’ ही होता है। यह देश बहुत विराट, विशाल और विविध है, लिहाजा ऐसे संकटों को संबोधित करना बड़ा मुश्किल होता है, लेकिन फिर सरकार किसलिए चुनी जाती है? इन संस्थानों की कार्य-प्रणाली और सम्यक सक्रियता भी सवालिया रही हैं। नतीजा यह है कि महंगाई हमारे लिए एक शाश्वत, चिरंतन और स्थायी समस्या बन कर रह गई है। बहरहाल महंगाई दर सिर्फ सब्जियों और खाद्य पदार्थों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि मौजूदा खुदरा महंगाई दर के कारण रेस्तरां-होटल 9.36 फीसदी, परिवहन 5 फीसदी से ज्यादा, शिक्षा सेवाएं और कपड़े-जूते करीब 4 फीसदी प्रति और घरेलू उपकरण 3.26 फीसदी महंगे हो गए हैं। जाहिर है कि औसत घर और परिवार का बजट बिखर और बिगड़ जाता है। औसत नौकरी, दिहाड़ीदार मजदूर, खेतिहर मजदूर, रिक्शेवाला, माल ढोने वाला अर्थात देश का गरीब तबका कहां से अतिरिक्त बजट का जुगाड़ करेगा, ताकि महंगाई से लड़ सके? कोई रास्ता नहीं, कोई समाधान नहीं…! सरकार और मंत्रीगण जुमले उछालने में व्यस्त हैं कि भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जल्द ही बन जाएगा। सरकारी किस्म के प्रवक्ता कांग्रेस नेतृत्व की यूपीए सरकार के दौरान 12-14 फीसदी मुद्रास्फीति से तुलना करने लगते हैं। यथार्थ तो यह है कि महंगाई बढ़ रही है, जो आम आदमी के लिए असहनीय है। रिजर्व बैंक को साढ़े तीन साल के बाद, अंतत:, रेपो रेट 0.25 फीसदी बढ़ाने पड़े। अब यह ब्याज दर 5.50 फीसदी हो गई है। नतीजतन आम उपभोक्ता के लिए गृह ऋण, वाहन ऋण, शिक्षा ऋण, मोबाइल ऋण आदि सभी की मासिक किस्तें बढ़ जाएंगी। इस महंगाई का बोझ कैसे उठाया जाए। संभव है कि बाजार में ऋण की मांग ही कम हो जाए! मांग कम होगी, तो बाजार प्रभावित होगा। बेशक सत्ताधीश चिंतन जरूर करते होंगे! केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को महंगाई के संबंध में किए गए वादे को निभाना चाहिए। महंगाई कम करके ही गरीबों का कल्याण होगा।



