‘शंघाई सहयोग संगठन’, आतंकवाद पर अकेली आवाज
‘शंघाई सहयोग संगठन’ में भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने किसी भी देश का नाम नहीं लिया, लेकिन एक बार फिर पाकिस्तान को ‘आतंकीस्तान’ करार दे दिया। दुनिया जानती है कि आतंकवाद का पर्याय कौनसा देश है। आतंकवाद अलगाववाद, चरमपंथ के साथ-साथ संवाद, सहयोग और कारोबार नहीं चल सकते। यह भारत की बुनियादी सोच है। बेशक हम पाकिस्तान के संदर्भ में यह सोच दोहराते रहे हैं, लेकिन इस बार ‘शंघाई सहयोग संगठन’ का मंच था, जिस पर पाकिस्तान और चीन के अलावा कुछ और राष्ट्र भी थे। ‘शंघाई सहयोग संगठन’ के जरिए जिस क्षेत्रीय सहयोग, आर्थिक मदद, आपसी कारोबार, ऊर्जा, डिजिटल सहयोग, क्षेत्रीय एकजुटता आदि की अपेक्षाएं की जा रही हैं, वे आतंकवाद के रहते हुए संभव नहीं हैं, लिहाजा इस अंतरराष्ट्रीय संगठन का मकसद नाकाम होता है। विदेश मंत्री जयशंकर ने चौतरफा विकास के लिए वास्तविक साझेदारी, शांति और स्थिरता के महत्व पर अपना पक्ष रखा। यदि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आतंकवाद जारी रहता है, तो कमोबेश देशों के बीच शांति, स्थिरता और ईमानदारी की स्थितियां बरकरार नहीं रह सकतीं। तो फिर इस संगठन का औचित्य ही क्या है? इस संगठन की स्थापना 15 जून, 2001 को चीन, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, रूस, ताजिकिस्तान और उजबेकिस्तान द्वारा शंघाई में की गई थी। समय के साथ इसका विस्तार हुआ और भारत, पाकिस्तान, ईरान सरीखे देश जुड़ते गए। इस बार पाकिस्तान में ‘शंघाई सहयोग संगठन’ की शासनाध्यक्ष परिषद की 23वीं बैठक हुई थी। विदेश मंत्री जयशंकर ने भारत की तरफ से शिरकत की, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी अन्य कार्यों में व्यस्त थे। जयशंकर जैसे भाव 2015 में तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने, पाकिस्तान की जमीं पर ही, व्यक्त किए थे, लेकिन इन 9 सालों में कुछ भी बदलाव नहीं हुआ। पाकिस्तान का सीमापार आतंकवाद आज भी जारी है और चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद तथा आम सभा में पाकिस्तान के आतंकवाद का बचाव करता रहा है, लिहाजा चीन भी आतंकवाद में भागीदार है।
विदेश मंत्री जयशंकर ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना को भी खारिज किया है, क्योंकि यह गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर से होकर गुजरता है। यह कश्मीर भी बुनियादी तौर पर भारत का ही है। आज भी हमारे जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद सक्रिय है। घटनाएं हर रोज हो रही हैं। इस गलियारे के जरिए आतंकवाद की भी मदद की जा सकती है। हालांकि ‘शंघाई सहयोग संगठन’ की बैठक के अंत में जारी एक साझा विज्ञप्ति में रूस, बेलारूस, ईरान, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, ताजिकिस्तान, उजबेकिस्तान आदि देशों ने चीनी संपर्क पहल, ‘वन बेल्ट वन रोड’, के लिए अपने समर्थन की पुष्टि की है। साफ है कि चीन पाक आर्थिक गलियारे के मुद्दे पर इस संगठन के अधिकतर देश भारत के निर्णय के विरोधी हैं। तो शंघाई सहयोग संगठन में भारत की मौजूदगी के फायदे क्या हैं? संगठन के लगभग सभी देशों के साथ, पाकिस्तान को छोड़ कर, भारत के व्यापारिक, सांस्कृतिक, राजनयिक रिश्ते हैं। शंघाई के कारण उनमें इजाफा नहीं हुआ है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि आतंकवाद जैसे मुद्दे पर भारत अकेली आवाज है, लेकिन उसकी गूंज ‘आसमानी’ है। भारत ने आतंकवाद को कई और वैश्विक मंचों पर उठाया है। उसे साझा घोषणा-पत्र में शामिल किया गया है। यदि वर्षों से भारत-पाकिस्तान के बीच बातचीत बंद है, तो उसकी बुनियादी वजह आतंकवाद ही है। भारत के प्रति पाकिस्तान का दुश्मनी और नफरत वाला व्यवहार किसी से छिपा नहीं है। जब शंघाई जैसे मंच पर आतंकवाद को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं, पाकिस्तान आतंकवाद को अब भी कबूल नहीं करता, तो संबंधों में सुधार कैसे संभव है? यदि शंघाई के मूल रचनाकार चीन की भूमिका को देखा जाए, तो दक्षिण एशिया में तानाशाही और आतंकवाद के प्रति वह बिल्कुल भी गंभीर या ईमानदार नहीं है। जयशंकर ने कहा कि क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता को मान्यता देनी चाहिए। यह वास्तविक साझेदारी पर आधारित होना चाहिए, न कि एकतरफा एजेंडे पर। यदि भरोसे की कमी है अथवा पर्याप्त सहयोग नहीं है, मित्रता कम हो गई है और अच्छे पड़ोसी की भावना गायब है, तो आत्मावलोकन करना चाहिए। बहरहाल बैठक के दौरान युद्ध, कोरोना महामारी और जलवायु परिवर्तन सरीखे मुद्दों पर भी बातचीत हुई, लेकिन जरूरत बुनियादी ईमानदारी की है, ताकि देशों के संबंध सुधर सकें। ऐसे सुधार के बाद ही किसी संगठन का औचित्य है। इस संगठन को नए संदर्भों में अपनी प्रासंगिकता अभी सिद्ध करनी है।


