विमर्श के केंद्र में ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’

वह कहते हैं कि, ‘कोई इस बात की अनदेखी नहीं कर सकता कि स्वतंत्रता पा लेना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना उसे बनाए रखने के लिए पक्के साधनों का पा लेना। स्वतंत्रता को मजबूत रखने वाली तो अन्ततोगत्वा एक भरोसेमन्द फौज ही है। ऐसी फौज जिस पर हर समय और किसी भी परिस्थिति में, देश के लिए लडऩे हेतु विश्वास किया जा सके। भारत में तो सेना संयुक्त ही होगी, जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही होंगे। मान लीजिये किसी विदेशी शक्ति का भारत पर आक्रमण होता है तो क्या सेना के मुसलमानों का भारत की रक्षा के लिए भरोसा किया जा सकता है? मान लीजिये हमलावर मुसलमानों का हम-मजहब हो तो क्या वे भारत की रक्षा के लिए उनका मुकाबला करेंगे या फिर उनकी तरफ हो जाएंगे…’
भीम-मीम के राजनीतिक नारे के कोलाहल के बीच डा. भीमराव रामजी अंबेडकर की पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ फिर से विमर्श के केंद्र में आ गई है। ऊपरी तौर से देखने पर ऐसा लगता है कि यह पुस्तक महज विभाजन के प्रश्न की व्याख्या करने के लिखी गई है, लेकिन डा. अंबेडकर ने अधिक गहराई तक उतरते हुए भारत में सांप्रदायिकता की जड़ों को तलाशने का प्रयास भी इस पुस्तक में किया है। इस पुस्तक की मुख्य खासियत ही यही है कि इसमें सांप्रदायिकता के प्रश्न को पूरी बौद्धिक ईमानदारी और साहस के साथ उठाया गया है। इसलिए अब जब सांप्रदायिकता नए-नए चेहरों के साथ सामने आ रही है, तो डा. अंबेडकर की इस पुस्तक का पुनर्पाठ आवश्यक हो जाता है। इस पुस्तक में सांप्रदायिकता के कारणों का विवेचन करते हुए डा. अंबेडकर व्यंग्य शैली में लिखते हैं- ‘क्या हिन्दू शासक जाति ने, जो हिन्दू राजनीति पर अपना नियंत्रण रखती है, अस्पृश्य और शूद्रों के हितों की अपेक्षा मुसलमानों के निहित स्वार्थों की सुरक्षा पर अधिक ध्यान नहीं दिया है? क्या श्री गांधी अस्पृश्यों को तो कोई भी राजनीतिक लाभ देने का विरोध करते हैं, लेकिन मुसलमानों के पक्ष में वे एक कोरे चैक पर हस्ताक्षर करने के लिए तत्पर नहीं हैं क्या? वास्तव में हिन्दू शासक जाति अस्पृश्यों तथा शूद्रों के साथ शासन में भाग लेने की अपेक्षा मुसलमानों के साथ शासन में भाग लेने को अधिक तत्पर दिखाई देती है।’ अंबेडकर सवर्ण जाति के लोगों को ही हिन्दू शासक जाति कहते हैं। अंबेडकर का यह प्रश्न कांग्रेस की मुस्लिम सांप्रदायिक नीति की पोल तो खोलता ही है, लेकिन उनकी मूल चिंता यह है कि आखिर कांग्रेस द्वारा इतना पालने-पोसने के बाद भी मुसलमान अलग देश की मांग क्यों कर रहे हैं?
अंबेडकर का आगे का प्रश्न और भी उत्तेजना भरा है। उनका मानना था कि किसी भी समुदाय की अनावश्यक मांगों को मानने से सामाजिक सौहार्द बढऩे की बजाय घटता है। कांग्रेस ने तो मुसलमानों को हिंदुओं के अधिकारों पर कुठाराघात करते हुए पहले ही अधिक अधिकार दिए हुए हैं। उनका प्रश्न है- ‘क्या विधानसभा में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात से अधिक नहीं है? क्या कनाडा, दक्षिणी अफ्रीका और स्विटजरलैंड में जातियों की जनसंख्या के अनुपात से भी अधिक प्रतिनिधित्व उन्हें नहीं दिया गया है? क्या जनसंख्या के अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व दिए जाने का भी मुसलमानों पर कोई प्रभाव पड़ा है? क्या इससे विधानसभा में हिन्दुओं का बहुमत घटता नहीं है? इसमें कितनी कमी आई है? अपने आप को केवल ब्रिटिश भारत तक ही सीमित रखते हुए और केवल उसी प्रतिनिधित्व का लेखा जोखा रखते हुए, जो निर्वाचन क्षेत्रों को प्रदान किया गया है, में स्थिति क्या है? भारत सरकार के अधिनियम 1935 के अनुसार केन्द्रीय विधानसभा के निचले सदन में कुल 187 स्थानों में से हिन्दुओं की की संख्या 105 और मुसलमानों की 82 है, जोकि मुसलमानों के जनसंख्या अनुपात से कहीं ज्यादा है।’ लेकिन इसके साथ ही अंबेडकर का शाश्वत प्रश्न फिर वहीं का वहीं है, इतने तुष्टीकरण के बाद भी मुसलमान भारत में क्यों नहीं रहना चाहते, वे भारत का विभाजन क्यों चाहते हैं। इस पुस्तक में डा. अंबेडकर की अन्य महत्वपूर्ण स्थापना भारत को एक नैसर्गिक भौगोलिक इकाई के रूप में स्वीकार करना है।
उनके लिए विभाजन राजनीतिक और कृत्रिम था। भारत की भौगोलिक एकता की तरफ संकेत करते हुए वह लिखते हैं कि, ‘हमें इस मौलिक तथ्य को नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति ने भारत को एक एकल भौगोलिक इकाई के रूप में निर्मित किया है। यह ठीक है कि भारतीय लड़ रहे हैं और कोई भी यह भविष्यवाणी नहीं कर सकता कि वे कब लडऩा बंद करेंगे, लेकिन इस तथ्य को स्वीकारने पर भी आखिर यह तो सोचना पड़ेगा कि इसका अर्थ क्या है? केवल यह कह देना कि भारतीय विवादी होते हैं, इस तथ्य को तो नहीं मिटा सकता कि भारत एक भौगोलिक इकाई है। इसकी एकता उतनी ही प्राचीन है जितनी प्रकृति स्वयं। भौगोलिक एकता के अलावा, यहां अत्यन्त प्राचीन काल से ही सांस्कृतिक एकता भी रही है। इसी सांस्कृतिक एकता ने ही तो यहां के राजनीतिक और जातीय अलगाव को झेला है। पिछले 150 साल से तो सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैधानिक और प्रशासनिक संस्थाएं एक सांझे उद्गम स्थल से कार्य कर रही हैं। पाकिस्तान को लेकर किसी भी विवाद के सन्दर्भ में यह तथ्य आंखों से ओझल नहीं किया जा सकता कि मूलत: भारत में आधारभूत एकता विद्यमान है।’ अपनी इस पुस्तक में सांकेतिक ढंग से उन्होंने कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं, जो आज भी साम्प्रदायिक मानसिकता को समझने में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
वह कहते हैं कि, ‘कोई इस बात की अनदेखी नहीं कर सकता कि स्वतंत्रता पा लेना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना उसे बनाए रखने के लिए पक्के साधनों का पा लेना। स्वतंत्रता को मजबूत रखने वाली तो अन्ततोगत्वा एक भरोसेमन्द फौज ही है। ऐसी फौज जिस पर हर समय और किसी भी परिस्थिति में, देश के लिए लडऩे हेतु विश्वास किया जा सके। भारत में तो सेना संयुक्त ही होगी, जिसमें हिन्दू और मुसलमान दोनों ही होंगे। मान लीजिये किसी विदेशी शक्ति का भारत पर आक्रमण होता है तो क्या सेना के मुसलमानों का भारत की रक्षा के लिए भरोसा किया जा सकता है? मान लीजिये हमलावर मुसलमानों का हम-मजहब हो तो क्या वे भारत की रक्षा के लिए उनका मुकाबला करेंगे या फिर उनकी तरफ हो जाएंगे। यह सवाल बहुत ही महत्व का है। लेकिन इस प्रश्न का उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि सेना में शामिल मुसलमानों को अलग राष्ट्र के सिद्धान्त, जो पाकिस्तान की नींव में है, की छूत कहां तक लग गई है। यदि उन्हें यह छूत लग गई है तो मान लेना चाहिये कि भारत की सेना खतरनाक हो गई है। भारत की आजादी की संरक्षक होने की बजाय वह उसके लिए खतरा पैदा करने वाली और धमकी देने वाली बन जाएगी। यह मेरा दृढ़ विश्वास है।’
इस्लामी राष्ट्र की छूत उत्पन्न हो जाने के बाद भारत की मुस्लिम समस्या का यह नीर-क्षीर विवेचन अंबेडकर का है। डा. अंबेडकर इस पुस्तक में दीवार पर लिखे सच को लिख रहे थे। एक ऐसे समय में जब नेहरु आकाश में रह कर भारत की खोज कर रहे थे। महात्मा गान्धी जमीन पर रहते थे, लेकिन वे मुसलमानों को लेकर मृगतृष्णा के शिकार थे। अंबेडकर भारत के हर गली-मोहल्ले में पसरे सच को स्पष्टत: और साहस के साथ लिख रहे थे। उनके लिखे सच का मोल आज पहले से भी अधिक बढ़ गया है। अंबेडकर ने जो सवाल उठाए हैं, उन पर चिंतन की जरूरत है।
कुलदीप चंद अग्निहोत्री



