राज्यसभा, बहुमत से दूर NDA

राज्यसभा में एनडीए के पास साधारण बहुमत नहीं होने के कारण अब किसी भी महत्वर्ण विधेयकों को पास कराने में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। पहले होता यह था कि लोकसभा में सहयोगी दलों के भरोसे दो तिहाई बहुमत और राज्यसभा में एन केन प्रकारेण साधारण बहुमत जुटा लिया जाता था, लेकिन वर्तमान में यह स्थिति नजर नहीं आ रही है।
बीते सप्ताह राज्यसभा के चार मनोनीत सदस्यों के अपना कार्यकाल पूरा कर लेने के बाद सदन में BJP सदस्यों की संख्या घटकर 86 रह गई। सदस्यता हासिल करने के बाद ये चारों औपचारिक तौर पर BJP से जुड़ गए थे। जाहिर है, अब सत्तारूढ़ पार्टी के फ्लोर मैनेजरों को बहुमत साधने के लिए थोड़ी और मशक्कत करनी पड़ेगी।
वैसे, राज्यसभा में बहुमत से दूरी BJP के लिए कोई नई बात नहीं है। लोकसभा में अपने दम पर बहुमत लेकर सरकार बनाने के बाद भी बीते दस वर्षों में उसे ऊपरी सदन में बहुमत प्राय: मैनेज ही करना पड़ा। आज भी जब लोकसभा में सत्तारूढ़ NDA को पूर्ण बहुमत हासिल है, राज्यसभा में उसकी कुल सदस्य संख्या 101 तक ही पहुंच पा रही है। 225 की मौजूदा सदस्य संख्या वाले सदन में साधारण बहुमत के लिए 113 का आंकड़ा जरूरी है।
ऐसे में जब इसी महीने की 22 तारीख से संसद का बजट सत्र शुरू हो रहा है, केंद्र सरकार की NDA से बाहर के दलों पर निर्भरता बढ़ गई है। हालांकि अब तक के अनुभव की रोशनी में देखें तो इन दलों के बीच से जरूरी समर्थन जुटाना सरकार के लिए कोई मुश्किल लक्ष्य नहीं है। खासकर तब, जब 11 सदस्यों वाली YSR कांग्रेस और 4 सदस्यों वाली AIADMK जैसी पार्टियां समर्थन देने को तैयार नजर आती हों।
वैसे, राज्यसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन की बहुमत से यह दूरी बनी नहीं रहने वाली। अभी सदन की कुल 20 सीटें खाली हैं। इनमें 11 सीटें निर्वाचित प्रतिनिधियों की हैं, जिनके लिए चुनाव इसी साल होने हैं। विधायकों की मौजूदा संख्या को देखते हुए इनमें से सात सीटें सहयोगी दलों को मिलनी तय मानी जा सकती हैं। इसके अलावा अगर महाराष्ट्र में विधायकों को एकजुट रखा जा सका तो दो और सीटें इनके खाते में जुड़ जाएंगी।
दूसरी ओर विपक्ष को देखें तो सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के पास अभी 26 सदस्य हैं। तेलंगाना विधानसभा की बदली सूरत के मद्देनजर वहां से एक सीट का इजाफा होना भी लगभग तय है। चूंकि नेता प्रतिपक्ष के पद के लिए न्यूनतम 25 सीटों की जरूरत होती है, इसलिए उस पर पार्टी को कोई खतरा नहीं है। कुल मिलाकर, आशा की जा सकती है कि विधेयकों पर राज्यसभा में आने वाले वक्त में सार्थक बहस दिखेगी।



