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 चीन-अमेरिका ने बना लिए अपने-अपने पाले, दुनिया में अभी कौन सा खेल चल रहा है?

आज दुनिया बहुपक्षीय व्यवस्था में है, लेकिन इसमें भी दो ध्रुवों का उभार साफ दिख रहा है। एक तरफ है अमेरिका, दूसरी ओर चीन। अमेरिका के साथ उसके पुराने सहयोगी हैं, जबकि चीन ने अपने साथ रूस और ईरान को खड़ा करने में सफलता पाई है। इसके साथ ही चीन शंघाई सहयोग संगठन के रूप में एक सैनिक-आर्थिक गठबंधन और ब्रिक्स के रूप में एक मजबूत आर्थिक मंच तैयार करने में सफल रहा है। वह दुनिया को एक साथ आर्थिक और सैन्य चुनौती देने में सक्षम है

UN बेबस
इसलिए आज का संकट केवल यह नहीं है कि इस्राइल और रूस जैसे देश विश्व को किसी बड़े युद्ध की ओर ले जा रहे हैं, बल्कि संकट यह है कि संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं शक्तिहीन हो गई हैं। सही मायने में आज संयुक्त राष्ट्र संघ की हैसियत कुछ उसी तरह की दिख रही है, जैसी दोनों विश्व युद्धों के बीच राष्ट्र संघ (लीग ऑफ नेशंस) की थी। इसलिए यदि युद्ध तेज हुए तो शांति का छोर आसानी से नहीं मिल पाएगा।

शांति दूर
ऐसे में UN जैसी संस्था से कोई अपेक्षा नहीं की जा सकती। फिर अपेक्षा करनी किससे चाहिए? क्या उस अमेरिका से, जो शक्ति अर्जित करने के लिए ‘स्मॉल स्केल वॉर्स’ को रणनीतिक हथियार बनाता रहा है या चीन से, जो एक तरफ एशिया-प्रशांत क्षेत्र में युद्धोन्मादी वातावरण बनाए हुए है और दूसरी तरफ अपनी ‘Debt Trap Diplomacy’ के जरिए नए किस्म के उपनिवेशवाद को लाना चाह रहा है? यह स्थिति दुनिया को किसी वैश्विक शांति की ओर ले जाने का संकेत तो बिल्कुल नहीं करती। अब तो अमेरिका में डॉनल्ड ट्रंप का शासन शुरू होने वाला है। वह अमेरिका फर्स्ट की ओर बढ़ने की कोशिश करेंगे, जिससे नए संघर्ष पैदा हो सकते हैं।

सीरिया का सच
सीरिया में असद शासन का ढहना एक सचाई है। लेकिन क्या यह भी सचाई हो सकती है कि इसे सिर्फ विद्रोहियों ने ढहा दिया? विभिन्न देशों की सैन्य क्षमता का आकलन करने वाले सूचकांक ‘ग्लोबल फायर पावर इंडेक्स’ की 2024 की लिस्ट में 145 देशों में सीरिया 60वें स्थान पर था। जिसके पास 3 लाख सैनिक, 1500 से ज्यादा टैंक, 3000 से अधिक बख्तरबंद वाहन, तोपखाना, मिसाइल सिस्टम के साथ फाइटर विमान, हेलिकॉप्टर और ट्रेनी विमान रहे हों, उसकी सेना दो सप्ताह के अंदर एक मिलिशिया ग्रुप के आगे घुटने टेक दे, कैसे? निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए टाइमिंग की तरफ देखना होगा। जब यूक्रेन में रूस सबसे चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा था और इस्राइल-ईरान संघर्ष प्रॉक्सी से प्रत्यक्ष की ओर बढ़ रहा था, तब विद्रोहियों का सीरिया पर कब्जा जमा लेना सामान्य बात नहीं हो सकती।

संघर्ष बढ़ेगा
सच तो यह है कि लड़ाई सीरिया में लड़ी जा रही थी, लेकिन लड़ने वाले बाहर से थे। इनमें अमेरिका, तुर्किये और चीन-रूस भी थे। इस पर विराम यहीं नहीं लगना है, यह आगे तक जाएगा। इस दृष्टि से ट्रंप का वाइट हाउस में पहुंचना महत्वपूर्ण होगा। अमेरिका इस उम्मीद में है कि ट्रंप प्रशासन देश को समृद्धि और वैश्विक दबदबे के एक नए युग की ओर ले जाएगा। हालांकि ऐसा करना अकेले अमेरिका के वश की बात नहीं है।

संकट में यूरोप

अमेरिका की उपलब्धियां उसके गठबंधन पर अधिक निर्भर रही हैं, जो अब कमजोर पड़ता दिख रहा है। इस गठबंधन में यूरोपीय देश अग्रणी थे, लेकिन आज उनमें से कई मुल्क आर्थिक और राजनीतिक संकट की चपेट में हैं। एक समय में ‘मरकोजी’ (जर्मन चांसलर मर्केल और फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी) इकॉनमिक्स के जरिए फ्रांस और जर्मनी यूरोपीय अर्थव्यवस्था को लीड करने का दम भर रहे थे, लेकिन अब यह इतिहास की चीज है। आज वहां अर्थव्यवस्थाएं मंदी की चपेट में हैं। इसके कारण राजनीतिक अव्यवस्था का वातावरण बन चुका है। फ्रांस और जर्मनी जिस स्थिति से गुजर रहे हैं, उससे नहीं लगता कि वे नैटो की मजबूती में विशेष योगदान दे पाएंगे।

एशिया में झटका
अमेरिका के एशियाई सहयोगियों में जापान और दक्षिण कोरिया भी राजनीतिक संकट से गुजर रहे हैं। दक्षिण कोरिया में राष्ट्रपति यून को मार्शल लॉ की घोषणा के कुछ दिनों बाद ही महाभियोग का सामना करना पड़ गया, जो पास भी हो गया। इसने कोरिया की साख को नुकसान पहुंचाया। अब संभव है कि वहां वामदलों की सरकार बने। ऐसा हुआ तो यह अमेरिका-दक्षिण कोरिया-जापान की त्रिपक्षीय सुरक्षा संरचना तैयार करने के प्रयासों पर नकारात्मक असर डाल सकता है, जिसकी पहल 2023 में राष्ट्रपति जो बाइडन द्वारा कैंप डेविड में की गई थी। जापान भी राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा है, जिसका असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है।

पड़ोसियों से बैर
मेक्सिको के साथ ट्रंप दीवार खड़ी करने की मंशा रखते हैं, जबकि कनाडा को सीधे चुनौती दे रहे हैं। कुल मिलाकर जिस गठबंधन ने अमेरिका को भू-राजनीतिक ताकत प्रदान की है, वह अब कमजोर और अक्षम दिख रहा है। इस गठबंधन के बिना न ‘अमेरिका फर्स्ट’ का ट्रंप का सपना पूरा हो पाएगा और न ही यूरोप की अर्थव्यवस्था फिर से दहाड़ मार पाएगी। लेकिन ट्रंप तो अमेरिका को स्वर्णयुग की ओर ले जाने का वादा करके सत्ता में आए हैं, उसका क्या होगा? संभव है, इसके लिए वह कोई गेम थिअरी अपनाएं। देखना यह होगा कि इस थिअरी में युद्धों को कितनी जगह मिलती है।-रहीस सिंह

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