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एआई के दखल से खेलों में बड़ा बदलाव, क्या मशीनें तय करेंगी खिलाड़ियों की जीत-हार

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के जरिए संस्कृति, कला और साहित्य जैसे तमाम क्षेत्रों में बदलाव आ रहा है। यहां तक कि खेल और खिलाड़ी की दुनिया भी बदलने लगी है। यह बदलाव कई मायने में बेहद दिलचस्प है। कैसा बदलाव आ रहा है, इसे जानना और समझना चाहिए। खेलों के बारे में आम धारणा बदल रही है। यह महज मनोरंजन या शौक नहीं, बल्कि दुनिया के देशों की खेल रणनीति भी है। कृत्रिम मेधा यानी एआइ के विस्तार के बाद बहुत कम समय में खेलों की दुनिया में बदलाव देखा जा रहा है।

एआइ की उपयोगिता जैसे-जैसे बढ़ रही है, वैसे-वैसे तमाम क्षेत्रों में इसकी उपयोगिता की संभावनाएं भी दिख रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से खेलों में इसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। कुछ लोगों का मानना है कि एआइ से प्रतियोगी खेलों में फायदे के साथ नुकसान भी हो सकता है, लेकिन ज्यादातर खेल विशेषज्ञों का मानना है कि इससे खेलों में तमाम तरह की सुविधाएं और पारदर्शिता बढ़ती है। माना जा रहा है कि आने वाले समय में खेल की दुनिया में बड़ा बदलाव होने की संभावनाएं हैं। इस पर भारत सहित दुनिया के तमाम देश प्रयोग कर रहे हैं।

दो दशक पहले खिलाड़ी केवल अपनी बुद्धि, अनुभव और अभ्यास पर निर्भर रहते थे, लेकिन कुछ ऐसे भी खेल हैं जिसमें एआइ का इस्तेमाल बहुत फायदेमंद पाया गया है। इनमें शतरंज, क्रिकेट, टेबल टेनिस और हाकी प्रमुख हैं। इनमें एआइ के इस्तेमाल को इन खेलों की रणनीति और निर्णय क्षमता के रूप में अपनाया जा रहा है। इसके बेहतर परिणाम देखे जा रहे हैं। खिलाड़ियों को रणनीति तैयार करने, विश्लेषण करने, प्रतिद्वंद्वी खिलाड़ियों के खेलने की शैली को बेहतर तरीके से समझने, गलतियों से सीखने और अपनी क्षमता को बढ़ाने में एआइ का इस्तेमाल शुरू हो गया है। खिलाड़ियों की सेहत बनाए रखने के लिए एआइ का बेहतर इस्तेमाल प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को दुरुस्त रखने में मददगार साबित हो सकता है। इससे खिलाड़ियों को बीमारियों से बचाने में भी मदद ली जाने लगी है।

एआइ का खेलों में सबसे अधिक उपयोग खिलाड़ियों के त्वरित निर्णय और डेटा आधारित विश्लेषण में किया जा रहा है। इससे विश्लेषण में पारदर्शिता और विश्वसनीयता आई है। शतरंज के खेल में प्रतिद्वंद्वी की चालों का अनुमान लगाने और खिलाड़ियों को नई रणनीतियां सुझाने में एआइ का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसी तरह वीडियो गेम में एआइ खेल के तौर-तरीके तैयार करती है। यह गलतियों की पहचान करती है और अभ्यास के लिए मार्गदर्शन देती है। इस नए साधन की मदद से खिलाड़ी तेजी से सुधार करते हैं। इससे खिलाड़ियों की निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। जैसे-जैसे एआइ का उपयोग बढ़ रहा है। खिलाड़ी इसके जरिए अपनी सफलता पर अधिक आश्वस्त होने लगे हैं।

खिलाड़ी एआइ के जरिए अपने प्रदर्शन का बेहतर विश्लेषण बहुत कम समय में कर सकता है। इसमें कैमरे और सेंसर के माध्यम से खिलाड़ियों की गतिविधियों और गति के वास्तविक समय का विश्लेषण करना आसान हो जाता है। इसी तरह खिलाड़ियों की जरूरतों के मुताबिक अनुकूलित प्रशिक्षण और आहार योजनाएं तैयार करने में भी एआइ की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। यह बीमारी को जल्दी समझने और स्वास्थ्य बेहतर बनाए रखने में बहुत उपयोगी साबित हो रही है। कृत्रिम मेधा शारीरिक डेटा की निगरानी कर खिलाड़ियों में थकान या चोट के जोखिम के बारे में पहले से ही बता सकती है। व्यक्तिगत प्रशिक्षण के लिए भी यह बहुत उपयोगी है। यह खिलाड़ियों की जरूरतों के अनुसार अनुकूलित प्रशिक्षण और अन्य योजनाएं तैयार करने में मदद करती है। खासकर हर तरह का सुधार लाने में मददगार साबित होती है। रेफरी और अंपायर के लिए सटीक निर्णय लेने में एआइ बेहतर निर्णय लेने में सहायता करती है। पिछले मैचों के दृश्य और आंकड़ों का गहन विश्लेषण कर प्रतिद्वंद्वी की ताकत और कमजोरी का पता इसके जरिए लगाया जाता है। यह नई प्रतिभाओं की खोज में भी बेहद सहायक है। इससे खेल की दुनिया में तमाम प्रतिभावान बच्चों को अधिक अवसर हासिल हो रहा है।

एआइ भले ही बुद्धिमत्ता का अब तक का सबसे बेहतर विकल्प मानी जा रही हो, लेकिन मानव के निर्णय लेने की क्षमता और अनुभव का कोई विकल्प नहीं है। जाहिर तौर पर खिलाड़ी की असली क्षमता इस बात से तय होती है कि यह एआइ को एक साधन के रूप में कैसे उपयोग करता है और वह अपने अनुभव का सही उपयोग और स्वतंत्र निर्णय लेने की कितनी क्षमता रखता है। एआइ केवल गति नाप सकती है और विश्लेषण कर सकती है, जबकि मानव खेल को भावना और रचनात्मकता देता है। खेल भावना से जुड़ी संवेदनाओं को एआइ नहीं समझ सकती। इसलिए कई कमियां भी एआइ में बताई जा रही हैं। भारत में ‘खेलो इंडिया’ के तहत नौ से 18 साल के बच्चों की प्रतिभा पहचानने और राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्रों में छह हजार से अधिक खिलाड़ियों के ‘बायोमैकेनिकल प्रोफाइलिंग’ के लिए एआइ का उपयोग किया जा रहा है। खिलाड़ियों के प्रदर्शन को बेहतर करने के मद्देनजर उनको वैज्ञानिक तरीके से निखारने और डेटा-आधारित दिशा देने के उद्देश्य से भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली ने भी इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया है। इससे खिलाड़ियों में नई ऊर्जा, शक्ति और उत्साह का संचार होना लाजिमी है।

खेल प्राधिकरण यूनिवर्सिटी आफ एक्सेटर की मदद से खेल प्रौद्योगिकी के द्वारा अभ्यास और डेटा एनालिटिक्स पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू कर रहा है। यह देश में खेल विज्ञान और तकनीक के समन्वय की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। यह प्रशिक्षण खासतौर पर खेल विशेषज्ञों, कोच, फिजियो फिटनेस विशेषज्ञों और खेल उद्यमियों के लिए तैयार किया गया है। एआइ का इस्तेमाल खेल और खिलाड़ियों के जरिए करने से भारत खेल की दुनिया में ऊंचा मुकाम हासिल कर सकता है। पिछले एक दशक में शतरंज, क्रिकेट, बास्केटबाल, तेज दौड़, तैराकी और तीरंदाजी सहित तमाम खेलों में एआइ के इस्तेमाल के मामले में हम आगे बढ़ गए हैं। आने वाला वक्त खिलाड़ियों के लिए विश्व स्तर पर कम समय में कामयाबी हासिल करने में एआइ की भूमिका कहीं ज्यादा हो सकेगी। ऐसा एआइ के जानकार मानते हैं।

हालांकि यह भी मानना है कि कृत्रिम मेधा का अधिक उपयोग खिलाड़ियों के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। इस पर निर्भरता से खिलाड़ी की स्वयं की निर्णय लेने की क्षमता में धीरे-धीरे कमी आने लगती है, जिससे उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है। इसी तरह बहुत जरूरी होने पर यदि एआइ की उपलब्धता नहीं हो पाई, तो ऐसे में खिलाड़ी असहज महसूस करता है, जिससे खिलाड़ी की रणनीति पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। यों एआइ में स्वत: स्फूर्ति-भावनाएं, प्रतिस्पर्धा और त्वरित निर्णय की क्षमता नहीं होती है। ऐसे में इसका उपयोग खिलाड़ी के लिए उल्टा परिणाम दे सकता है। इसलिए इसका इस्तेमाल बहुत सोच-समझ कर करने की जरूरत होगी। यह भी देखना होगा कि यह समाधान के बजाय समस्या न बन जाए। एआइ के जरिए सकारात्मक परिणामों के लिए नए-नए प्रयोग और शोध हो रहे हैं। इससे खेल की दुनिया में भारत चीन, अमेरिका, ब्राजील, जापान, रूस, कोरिया और फ्रांस जैसे देशों की कतार में आ सकता है।

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