संपादकीय

‘आकाशवाणी’ बना जंतर-मंतर

विपक्ष के ‘इंडी’ गठबंधन ने ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ निकाला, लेकिन वह हुजूम के अलावा कुछ भी साबित नहीं हुआ। अंतत: विरोध-प्रदर्शन ‘बंजर’ ही रहा। यदि विपक्ष को मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और दो चुनाव आयुक्तों से मिल कर अपना ज्ञापन सौंपना था, तो संवैधानिक संस्था के प्रोटोकॉल के मुताबिक, समय मांगना चाहिए था। करीब 200 या 300 सांसद एकसाथ चुनाव आयोग में न तो जा सकते हैं और न ही कोई सार्थक संवाद संभव है, लिहाजा विपक्ष के 5-7 नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल तय किया जाना चाहिए था, जो चुनाव आयोग में संवाद कर सकता था। बैरिकेड्स पर चढऩा, अपनी पहलवानी मुद्राएं दिखाना और अनाप-शनाप नारेबाजी करने से न तो सत्ताएं घबराती हैं और न ही सीईसी ज्ञानेश कुमार गुप्ता डर कर इस्तीफा दे सकते हैं। उन्हें भी संविधान का संरक्षण हासिल है। सवाल आंदोलन की नीयत और हुजूम की अराजकता का भी है। जब विपक्ष को चुनाव आयोग के मुख्यालय तक मार्च करना था, तो लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, उनकी सांसद बहन प्रियंका गांधी और कुछ पिछलग्गू कांग्रेसी सांसद अचानक ‘आकाशवाणी भवन’ में क्यों घुस गए? वहां सरकारी दफ्तर हैं, जो कामकाज करते रहते हैं। उन्हें बाधा पहुंचाना भी दंडनीय अपराध है। कांग्रेस गच्चा देकर चुनाव आयोग तक पहुंचने की ‘पहलवानी’ की रणनीति खेल रही होगी, क्योंकि ‘आकाशवाणी’ के पिछले दरवाजे से आयोग का मुख्य दरवाजा कुछ मीटर के फासले पर ही था, लेकिन सुरक्षा-व्यवस्था अपेक्षाकृत ज्यादा चौकन्नी होती है।

वह दरवाजा स्थायी रूप से बंद कर दिया गया था। अंतत: राहुल गांधी और सहयोगी प्रदर्शनकारियों को हार कर, ‘आकाशवाणी भवन’ के भीतर ही, बरगद के पुराने पेड़ की छाया में, कथित धरना देना पड़ा। यह नेता प्रतिपक्ष के संवैधानिक पद के प्रति सम्मान का भाव ही था कि पुलिस अधिकारी और बाद में गृह मंत्रालय के आला अफसरों ने राहुल गांधी को समझाया कि ‘आकाशवाणी भवन’ जंतर-मंतर नहीं है। धरने-प्रदर्शन का अधिकृत स्थान नहीं है, लिहाजा उन्हें धरना समाप्त कर देना चाहिए। लेकिन राहुल, प्रियंका, वेणुगोपाल, दीपेन्द्र हुड्डा, पवन खेड़ा आदि कांग्रेसी सांसद करीब 9 घंटे तक पेड़ के नीचे बैठे रहे। वहीं खाना-पीना जारी रहा। यह कैसा विरोध-प्रदर्शन था! नारेबाजी भी थक कर खामोश हो चुकी थी। सांसद अलसा रहे थे। अंतत: गृह मंत्रालय के शीर्ष आदेशों के बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें जबरन उठाया और हिरासत में लेकर किंग्सवे कैंप पुलिस लाइन भेज दिया। रात्रि करीब 10 बजे सभी को मुक्त भी कर दिया गया। क्या हासिल हुआ? क्या ऐसे हुजूम से चुनाव आयोग घुटने टेक सकता है? क्या करोड़ों मतदाताओं को उनका मताधिकार बहाल कराया जा सकता है? दिन भर के नाटक का तो पटाक्षेप हो गया, उसी दौरान कुछ पुराने वीडियो टीवी चैनलों पर दिखाई दिए। उनमें खुद राहुल गांधी, राजस्थान के तीन बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत और कांग्रेस नेता सचिन पायलट आदि ‘डुप्लीकेट’ और ‘फर्जी’ मतदाताओं की शिकायत कर रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर भी बयान दे चुके हैं कि केरलम में मतदाता सूचियों से ‘फर्जी’ नाम काट देने का फायदा पार्टी को मिला और सरकार बन सकी। वीडियो में कांग्रेसी नेता ‘डुप्लीकेट’ नामों को समाप्त करने की मांग कर रहे थे। अब चुनाव आयोग के अभियान में कई विसंगतियां, गलतियां, लापरवाहियां सामने आई हैं, लेकिन अब मामला सर्वोच्च अदालत के विचाराधीन है।

कमोबेश उसे ‘न्याय’ करने दीजिए। अदालत का ‘न्याय’ भी उचित न लगे, तो आंदोलन का रास्ता तो हमेशा खुला है। एक और ऐतिहासिक तथ्य सामने रखने का मन कर रहा है। यदि तमिलनाडु में 1967 से, बंगाल में 1977 से, उप्र में 1989 से, गुजरात में 1995 से और ओडिशा में 2005 से कांग्रेस सत्ता से बाहर है, तो ये ‘वोट चोरी’ के नतीजतन नहीं हैं। जनता ने उसे खारिज किया है, लिहाजा जनमत लगातार कांग्रेस के खिलाफ रहा है। कांग्रेस करीब 280 लोकसभा सीटों के समान क्षेत्रों में ‘शून्य’ हो चुकी है। यह शून्यता चुनाव आयोग के किसी अभियान की वजह से नहीं है, लिहाजा कांग्रेस को देश के ज्वलंत मुद्दों पर भी सडक़ों पर बिछ जाना चाहिए। यह भी जन-सरोकार का मुद्दा है, लेकिन इसे गंभीरता और कानूनी दायरे में रह कर लेना चाहिए, आंदोलन में जनता को सम्मिलित करना चाहिए। अलबत्ता हुजूम इक_े करते रहिए, नतीजा बहुत अच्छा मिलना बेहद मुश्किल है। हमारा मानना है कि लोकतंत्र में विपक्ष की भी बड़ी भूमिका होती है, इसलिए कांग्रेस को मजबूत किया जाना चाहिए।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button